Wednesday, February 17, 2010

रोशनी की लकीरें

कुछ दूर रख कर
कुछ फ़ासले से देखा
कागज़ पर उतरते नक्श को

धरती पर उतरती सूरज की छाया
जैसे बदलती हर पहर के रूप
गाढ़े रंग, हल्के रंग
आढ़ी, तिरछी रोशनी की लकीरें
सब उतर गए थे छवि के संग
उन के बीच में थी
वो
उदास आँखें जो
बीन रहीं थी
बसंत में खिले
रोशनी से भरे
सफ़ेद चेरी के फूल।

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5 comments:

डॉ .अनुराग said...

वो
उदास आँखें जो
बीन रहीं थी
बसंत में खिले
रोशनी से भरे
सफ़ेद चेरी के फूल।

अद्भुत पंक्तिया

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है।बधाई स्वीकारें।

Udan Tashtari said...

उन के बीच में थी
वो
उदास आँखें जो
बीन रहीं थी
बसंत में खिले
रोशनी से भरे
सफ़ेद चेरी के फूल।

ओह! लाजबाब!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत बढ़िया लगीं भावपूर्ण पंक्तियाँ और साल गिरह की अनेक शुभकामनाएं भी आपके लिए
और
उदास आँखें फिर मुस्कुरा उठें ये कामना भी :)
स स्नेह,
- लावण्या

आओ बात करें .......! said...

बसंत में खिले फूल झकाझक
सूरज चमचमा रहे हैं गगन में भकाभक
फिर भी फूल बीनती आँखें मिली उदास यकायक!
रोशनी की लकीरों का ये कैसा खेल भयानक.