रजनीगन्धा

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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Sunday, October 25, 2009

गाँठ

मेरे सर्वस्व की गाँठ
पानी, आग, धरा, पंचतंत्रो से गुँथी है,
अक्षत, रोली, मौली, धूप, दीप
से बनी है,
देवी, देवताओं, खड़िया से दीवार पर सजी है,
पेड़ों की फ़ुनगी पर नभ से बंधी रहती है
खुलती है तो छाँव सी धूप में घुल जाती है,
दिन जब चढ़ता है तो
बड़ या पीपल पर मन्न्त सी चढ़ जाती है।

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Friday, October 23, 2009

फ़ुर्सत के पल

पलाश के दहकते फूल
जब मेरी हथेली पर गिरते हैं,
फिसलते हुए ये जलते सूरज
मेरे मन में परिक्रमा करते हैं ।

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परिधि के घेरे में आ बैठे हैं,
कुछ चिन्ह नियुक्त कर बैठे हैं,
चिन्हों से जूझते हुए
परिधि में खुद को खो बैठे हैं।

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शब्दों का प्रांगण
पहेलियों का आँगन,
चौक जब भी पूरती हूँ,
होता है विचारों का आगमन।

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Thursday, October 08, 2009

मूक अभिवादन

घर की परिधि के दायरे
मेरे मानचित्र पर बिंदु से
उस पगडंडी पर रहते हैं
जहाँ सूर्योदय रोज़ तुम्हारे द्वार पर
लौटती सूर्य किरण की प्रतीक्षा करता है
पहाड़ी के उस ओर से
बादलों की टोली को हवा धकेल ले आती है
और
गुलदावदी के फूल हवा को छुपा कर
यूँ ही लहकते फ़िरते हैं

मैं और मेरा गुमान
तुमसे अनभिज्ञ
चुपचाप उस पगडंडी पर
मील पत्थर रखते जाते हैं,
क्षितिज को सोपान बना कर
परिधि को विस्तृत कर नित
मूक अभिवादन करते हैं।
मैं और मेरा गुमान
तुमसे प्यार किया करते है।

Wednesday, September 30, 2009

क्वार गीत

रास्ते में जब रुकी तो
दीवारों के कान उग आए थे
पत्तों की सरसराह्ट थी
आँगन में बुदबुदाहट थी
और
दीवारों की आँखों में रंग भर गए थे
कपाट पर कूची से बूटे खिले थे
सफ़ेद पुती दीवार पर जलाशय बने थे
बाहर
अहाते में तिमिर का कोलाहल बोल रहा था
झींगुर की आवाज़े थीं
चन्द्रकिरण की आने की आह्टें थी

रास्ते में जब रुकी तो
मेरे अंदर डूब गई थी सब आवाज़ें
उग आया था एक दरख्त जहाँ
बसती है लाल गौरैया
गाती है वो क्वार गीत जो
पतझड़ में भी बसंत का आभास दिला जाता है।

Thursday, September 17, 2009

आसमानी फूल

सेतू के किनारे खिले थे
कुछ आसमानी फूल,
पानी में बिम्बित था
सुनहरी आकाश अपार,

मैंने आकाश की असीमता
उठा के दी थी तुम्हे,
तुम्हारी असीमता में मुझे मिले
कुछ फूल उपहार में,
आँगन में मेघदूत मिले
काले और बौराए से,
और
संदेसों की झारी में
गुलाब की कुछ पाँखुरी पड़ी

काली स्याह रात में
जब असीमता ढली,
चाँदनी दबे पाँव
ले आई थी कहानी तारों की
और एक उल्का खिली थी
मेरे सिरहाने ले के
कुछ आसमानी फूल

Saturday, August 01, 2009

तमन्ना

एक तमन्ना छोटी सी,
बड़ी आँखों वाली लड़की की
खामोशी में रहती थी,
लड़की के गालों के गुच्चों में
मुस्कराहट में छिपी रहती थी,
लड़की के काले बालों की
चोटी में फूल सी गुँथी रहती थी

एक तमन्ना बड़ी सी,
रसॊई के आले में
आचार के मर्तबान में रहती है
फ़टी रसीद सी
पंसारी की दुकान में रहती है
माधो, बिट्टो की
शादी के लेन -देन में रहती है
बगीचे के फव्वारे के
नीचे पानी में पड़े सिक्कों में रहती है

छोटी तमन्ना चुलबुली सी
बड़ी तमन्ना संजीदी सी
हर साँझ छुप्पा छुप्पी खेलती हैं
कुट्टी, अब्बा कर के रात को
सपनों में चाँद पर बैठी मिलती हैं।

Friday, July 03, 2009

जेठ बुलाए

उड़ती फ़ूस
कटी-कटी धूप
गुड़-गुड़ करती
बाबा के हुक्के की मूँज

जेठ दुपहरी
छाँव तले गिलहरी
किट-किट करती
अम्मा की सुपारी दिन सून

लम्बे दिन
लम्बी तारीखें
औंधे मुँह ऊँघती
जीजी की किताबें, परचून

गुम हवा
झुलसी धरा
मेढ़ पर सोचती
उसकी आँखें लगी, सब सून
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