Monday, March 01, 2010

पलाश के फूल

कोयल कुहकी
अमुआ महकी
पोखर पीला
सूरज निकला
ले फूलों के कलश कई

ड्योढ़ी फैले
अंगना खेले
नव पल्लव
पक्षी का कलरव
उल्ल्सित बसंत से खेल कई

गुब्बारे फूटे
गुलाल, रंग छूटे
अब गली ढूँढॆ
नुक्कड़ ढूँढे
वह दिवस जब बिखरे थे रंग कई

चौबारे के रंग
घर में हैं बंद
सूखी होली
जाए अबोली
बुलाए दर पर छपे पलाश के फूल कई।


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8 comments:

राकेश कौशिक said...

होली की विलंबित बधाई

डॉ .अनुराग said...

आहा !

Mithilesh dubey said...

बहुत ही खूबसूरत ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

vaah.

फ़िरदौस ख़ान said...

लाजवाब रचना है...बधाई...होली की शुभकामनाएं...

पुष्पा बजाज said...

सुंदर !

अच्छा लगा !

सत के हित में जो लिखा जाये वही तो साहित्य है

आइये सत का दीदार थोरा ऐसे भी करे !
http://thakurmere.blogspot.com/

राकेश खंडेलवाल said...

चौबारे के रंग
घर में हैं बंद
सूखी होली
जाए अबोली

सुन्दर चित्र खींचा है शब्दों से

आओ बात करें .......! said...

कभी तो ढोलक बाजेगी
कभी तो घुंगरू झनकेगी
कभी तो गुलाल भुरकेगी
कभी तो गोपी आएगी
रसिया को रंग लगाएगी
और......कभी तो होली बोलेगी!!