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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Monday, September 03, 2007

अमलतास

जेठ की दुपहरी में
अलसाई धूप को लपेटे,
अमलतास लेता है अँगड़ाई,
मैं सिहर जाती हूँ,
छू जाती है जब ठँडी पुरवाई.

सूरज की किरणें जब पीले गुँचों में
नज़र आती हैं.
आँखों में फ़िरकनी घूम जाती है.

गुम दोपहरी में मैं,
पीले सूखे फूल मुट्ठी में भर कर,
बाबा को दे आती थी,
बाबा फ़ूँक मारते थे तो
हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती थीं.

अमलतास के गले लग कर
हम अपनी बाँहों का घेरा नापते थे,
मेरा घेरा बढ़ता रहता था पर
बाबा का घेरा नहीं बढ़ता था.
मैं इंतज़ार करती रही कि
बाबा का घेरा कब बढ़ेगा.

घर के अहाते में आज
मेरे बिटिया की मुट्ठी में पीले सूखे फूल हैं,
फ़ूँक मारो तो हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती हैं.
मेरा घेरा लेकिन अब नहीं बढ़ता,
लगता है अमलतास भी उतना का उतना ही है ।

6 Comments:

Anonymous अफ़लातून said...

अमलतास के प्रिय फूलों का सम्मान हुआ।आभार।

9:12 PM  
Blogger Beji said...

बहुत सुंदर...खास पसंद आई...

बाबा फ़ूँक मारते थे तो
हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती थीं.

10:12 PM  
Blogger Lavanyam -Antarman said...

Behad khoobsurat bhaav samete ye kavit bahot pasand aayee Rajni ji ....
Aap likha kijiye ...un hee ...
sneh ke sath,
Lavanya

10:52 AM  
Blogger अनूप शुक्ला said...

सुन्दर!

7:11 PM  
Blogger Divine India said...

पहली बार आपके ब्लाग पर आया…
बेहतरीन रचना पढ़ने का मौका मिला…
बहुत ही शानदार कविता है…
बस मजा आगया…।

11:54 PM  
Blogger हर्षवर्धन said...

रजनीजी
अमेरिका में जेठ की दुपहरी का अहसास आप कर पा रही हैं। सुखद है।

9:43 PM  

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