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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Tuesday, September 02, 2008

नानाजी की टोपी

मैं नानाजी की टोपी,
चाँद की किरण से सीती थी।

अंदर से टोपी उधड़ गई थी।
उम्र में बड़ी हो गई थी।
थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी।
जब तागे निकल जाते थे तो
झूमर से लहराते थी।
बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे।

टोपी अब भी पुख्ता थी।
ऐसे लगता था जैसे कोई मनौती हो,
दुआ सी असर करती थी।
नानाजी को ठंड से बचाए रखती थी।

चाँद की किरण तिलस्मी होती है,
अम्बर की परी नानाजी की सहेली होती थी।
टोपी जब ठीक हो जाती थी
ढेरों आशीषों की बरसात होती थी।
नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,
मेरे पास आशीषों की बरसात।

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17 Comments:

Blogger manvinder bhimber said...

अंदर से टोपी उधड़ गई थी।
उम्र में बड़ी हो गई थी।
थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी।
जब तागे निकल जाते थे तो
झूमर से लहराते थी।
बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे।

bahut hi bhawporn likha hai...
bdhaae

6:46 PM  
Blogger मीत said...

ऐसे लगता था जैसे कोई मनौती हो,
दुआ सी असर करती थी।

नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,
मेरे पास आशीषों की बरसात।

बहुत खूब. बहुत ही बढ़िया.

7:13 PM  
Blogger Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुंदर कविता है. पढ़कर मुझे अपने नानाजी याद आ गए.

8:28 PM  
Blogger अनुराग said...

चाँद की किरण तिलस्मी होती है,
अम्बर की परी नानाजी की सहेली होती थी।
टोपी जब ठीक हो जाती थी
ढेरों आशीषों की बरसात होती थी।
नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,
मेरे पास आशीषों की बरसात।



बेहद भावपूर्ण ओर मासूम.....कई दिनों बाद आयी आप ?मसरूफ है कही ?

11:19 PM  
Blogger निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

nanaji par behad sundar rachana lagi . dhanyawad.

1:45 AM  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

बहुत विलक्षण बिम्ब और शब्द चुने हैं आपने इस रचना के लिए..बहुत खूब...वाह.
नीरज

3:21 AM  
Blogger Dr. Amar Jyoti said...

एक अछूते विषय का मर्मस्पर्शी और अनूठा चित्रण।
बधाई ही नहीं आभार भी ऐसी रचना देने के लिये।

4:38 AM  
Blogger Pratyaksha said...

बहुत सुंदर !
और कहाँ रहीं इतने दिन ?

5:32 AM  
Blogger pallavi trivedi said...

चाँद की किरण तिलस्मी होती है,
अम्बर की परी नानाजी की सहेली होती थी।
टोपी जब ठीक हो जाती थी
ढेरों आशीषों की बरसात होती थी।
नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,
मेरे पास आशीषों की बरसात।
bahut sundar...

8:35 AM  
Blogger कामोद Kaamod said...

अंदर से टोपी उधड़ गई थी।
उम्र में बड़ी हो गई थी।
थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी।
जब तागे निकल जाते थे तो
झूमर से लहराते थी।

साधारण से शब्द और गहरी बात ...
बहुत बढ़िया

10:13 AM  
Blogger Lavanyam - Antarman said...

अरे वाह,
इत्तनी प्यारी कविता लिये
आज आप आईँ हैँ :)
स स्नेह,

- लावण्या

12:38 PM  
Blogger swati said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है। सस्नेह

6:10 AM  
Blogger राकेश खंडेलवाल said...

हां वे अनदेखे टांके
अभी भी मज़बूती से
हवाओं के धागे से
जोड़े हुए हैं
उस एक अहसास को
जो जुड़ा है
सब असे

6:44 PM  
Blogger Purnima said...

bahut accha likha hai mam...
simply very good....
thank u....

10:19 AM  
Blogger ashok priyaranjan said...

rajniji
aapki rachana mein bhav, prateek aur samvedna bahut achchi hai.kabhi mere blog per bhi aaiye.

6:23 AM  
Blogger hemant richhariya said...

bhavon ka sundar chitran. par laya me kuchh kami najar aai. kahin kahin tuk thik nahi baith pa rahi hai. koshish karti rahen. meri shubhkamnayen.

7:17 AM  
Blogger संगीता मनराल said...

बहुत खूबसूरत! मुझे मेरे नाना जी की याद आ गई

9:34 PM  

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