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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Thursday, September 18, 2008

आरिगामी

धूप और पत्तों की आरिगामी
मेरी खिड़की पर बन रही थी,
सुबह के बदलते पहर
मुड़ते, खुलते
खिड़की के एक कोने पर
सीमित रह गए थे।
उस आरिगामी में रह गई थी अब,
एक मैना,
एक पत्ती,
एक टुकड़ा धूप।

धूप सरकी,
पत्ती टूटी,
मैना उड़ गई,
और,
अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये
नई आरिगामी बनने के लिये।

_________________

25 Comments:

Blogger Manoshi said...

बहुत ही सुंदर...

7:40 PM  
Blogger मीत said...

दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये
नई आरिगामी बनने के लिये।

बहुत ख़ूब.

7:41 PM  
Anonymous अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

7:45 PM  
Blogger manvinder bhimber said...

धूप और पत्तों की आरिगामी
मेरी खिड़की पर बन रही थी,
सुबह के बदलते पहर
मुड़ते, खुलते
खिड़की के एक कोने पर
सीमित रह गए थे।
उस आरिगामी में रह गई थी अब,
एक मैना,
एक पत्ती,
एक टुकड़ा धूप।
waah ....bahut sunder

8:14 PM  
Blogger Pratyaksha said...

उड़ी हुई मैना फिर आयेगी
धूप में..
बहुत सुंदर !

9:05 PM  
Blogger Parul said...

bahut- bahut acchey

9:21 PM  
Blogger श्रीकांत पाराशर said...

Bahut badhia rachna.

10:34 PM  
Blogger Advocate Rashmi saurana said...

धूप सरकी,
पत्ती टूटी,
मैना उड़ गई,
और,
अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
bhut sundar. ati uttam jari rhe.

11:54 PM  
Blogger ashok priyaranjan said...

rajniji,
prakiti key dradshya ka bhut sundar chitran kiya hai aapney. aapki abhivyakti badi prakhar hai.kabhi fursat ho to mere blog per bhi aayein.

12:16 AM  
Blogger फ़िरदौस ख़ान said...

धूप और पत्तों की आरिगामी
मेरी खिड़की पर बन रही थी,
सुबह के बदलते पहर
मुड़ते, खुलते
खिड़की के एक कोने पर
सीमित रह गए थे।
उस आरिगामी में रह गई थी अब,
एक मैना,
एक पत्ती,
एक टुकड़ा धूप।

बहुत ही उम्दा...

12:40 AM  
Blogger Udan Tashtari said...

बेहतरीन!! वाह!

3:15 AM  
Blogger कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

एक मैना,
एक पत्ती,
एक टुकड़ा धूप।

kya baat hai.. bahut hi sundar..

4:56 AM  
Blogger कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

arey waah lagta hai main aapka blog padh raha tha aur aap mera blog padh rahi thi.. aap comment bhi abhi mila mujhe.. :)

4:57 AM  
Blogger डॉ .अनुराग said...

(३)रजनी जी
धूप सरकी,
पत्ती टूटी,
मैना उड़ गई,
और,
अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये
नई आरिगामी बनने के लिये।......बहुत सुंदर......

6:07 AM  
Blogger लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत सुँदर !
बडे दिनोँ बाद
आना हुआ
पर इस के साथ :)
स्नेह,

- लावण्या

12:50 PM  
Blogger pallavi trivedi said...

bahut sundar....

1:36 AM  
Blogger योगेन्द्र मौदगिल said...

अद्भुत भावबोध...
आपको बधाई..

4:52 AM  
Blogger Dr. Nazar Mahmood said...

its really wseet
wow

12:14 AM  
Blogger Dr. Nazar Mahmood said...

SWEET

12:14 AM  
Blogger vijaymaudgill said...

धूप सरकी,
पत्ती टूटी,
मैना उड़ गई,
और,
अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
वाह क्या बात है।
रजनी जी आपकी पोस्ट बहुत ही लाजवाब है। और उससे भी लाजवाब है आपकी मुस्कान। भगवान करे आपकी ये मुस्कान सदा बरकरार रहे। सिर्फ़ चेहरे से ही नहीं बल्कि अंतरआत्मा से भी।
शुभकामनाएं

8:50 AM  
Blogger poemsnpuja said...

bahut khoobsoorat, bahut pyaari.

5:21 AM  
Blogger BrijmohanShrivastava said...

आरिगामी का अर्थ में समझ नहीं पाया मुआफी चाहता हूँ

2:11 AM  
Blogger श्यामल सुमन said...

अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये
नई आरिगामी बनने के लिये।

बहुत अच्छी पंक्तियाँ। मन को छू लेनेवाली।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.

7:10 PM  
Blogger "VISHAL" said...

एक मैना,
एक पत्ती,
एक टुकड़ा धूप।

धूप सरकी,
पत्ती टूटी,
मैना उड़ गई,
और,
अब रह गया है
सिर्फ़ कोरा कागज़
दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये
नई आरिगामी बनने के लिये।


bahut hi sundar

2:35 AM  
Blogger Reetesh Gupta said...

बहुत दिनो बाद आपके ब्लाग पर आया हूँ ..और यह सुंदर कविता पढ़ने को मिली...बधाई

4:39 PM  

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