Saturday, September 24, 2011

चाँदनी और नमी

चलो आज फिर रात के सायों तले
टिप टिप करती बूँदों को पिरो लें
तुम उनको खिड़की में रखना
मैं उनको चाँदनी का जामा पहनाऊँगी
चाँदनी का लिबास पहन कर बूँदें
जब नीचे उतरेंगीं तो रास्ते में
खो न जाएँ,
आसमान की डिबिया बना देना
हम खोलेंगे उसे अमावस के दिन
तब चाँदनी होगी और नमी भी होगी

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3 comments:

मानसी said...

kitha sundar hai...

डॉ .अनुराग said...

खूबसूरत !

Rachana said...

bahut sunder kalpna
badhai
rachana