My Photo
Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Monday, December 03, 2007

अम्मा की रसोई

अम्मा की रसोई में
सुबह शाम जलता चूल्हा,
बच्चों का उपर नीचे कूदना,
किसी का झिड़की खाना
तो किसी का आंचल में छुप जाना,
दिन गुज़रता था ऐसे
हर पल सँवरता हो जैसे।
कितने प्रश्न अम्मा के सामने जा बैठते थे,
अम्मा उन्हें हर कोने से उठा कर
तरतीब से लगाती थी,
जैसे अँगीठी में जलते कोयलों को
अँगुलियों से ठीक तरह लगाती हों।
दिन भर प्रश्नों से जूझना,
साँझ ढले उन्हे गोद में ले कर सो जाना,
अम्मा ने भेद लिया था संसार का सार,
सृष्टि का किया था नव निर्माण।
रूढियों में बँध कर पाला था ये संसार,
जो रोपा था दहलीज़ के इस पार,
बाँट दी धरोहर आज सब उस पार।

_____________________

10 Comments:

Blogger अजित वडनेरकर said...

जबर्दस्त कविता।

2:58 PM  
Blogger Abhishek Sinha said...

सुन्दर , मर्ममय ।

8:50 PM  
Blogger Aflatoon said...

सजीव । बधायी ।

10:27 PM  
Blogger Sanjeet Tripathi said...

सुंदर!!

12:19 AM  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

वाह. भावपूर्ण कविता
बधाई
नीरज

3:05 AM  
Blogger मीत said...

आहा ! कमाल है. जाने किन ख़यालों में खो गया हूँ. जाने क्या .... क्या क्या कह गई आपकी रचना.

10:13 AM  
Blogger Beji said...

कितने दिनों बाद लिखा है आपने....सुंदर....आप ऐसा ही लिखती हैं हर बार...!!

10:13 AM  
Blogger Reetesh Gupta said...

अच्छा लगा पढ़कर ...सुंदर भाव ...बधाई

9:43 AM  
Blogger Hindi Granth Karyalaya said...

बहुत खूब |

3:22 PM  
Blogger vijay gaur said...

kavitaon mai ek tajgi hai. lekin bhoogol nhi badalta hai.

8:11 PM  

Post a Comment

<< Home