Friday, August 13, 2010

आसपास

लगता है क्यों कि तुम हो आसपास
इन्द्रधनुष का एक रंग जो
लाल मौली सा खिंचा था क्षितिज के आसपास
बांध दिया था सूरज को उस मौली से आज,
मैं हरी दूब सी बिछी
पकड़े हुई थी दूसरा सिरा
सूरज को गांठ में बांध कर
नितल में छोड़ आई थी,
तुमने बदमाशी की थी,
रात को तुम गहराई से निकाल लाए थे,
आज पत्ते से लटकी ओस की बूँद में
तारे सा सूरज झिलामिला रहा था।
जब उसको देखा था तो
जाने क्या जता रहा था,
अपने पास बुला रहा था,
क्यों
लगा कि तुम हो आसपास।

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2 comments:

चिट्ठाप्रहरी टीम said...

एक अच्छी पोस्ट लिखी है आपने ,शुभकामनाएँ और आभार

आदरणीय
हिन्दी ब्लाँगजगत का चिट्ठा संकलक चिट्ठाप्रहरी अब शुरु कर दिया गया है । अपना ब्लाँग इसमे जोङकर हिन्दी ब्लाँगिँग को उंचाईयोँ पर ले जायेँ

यहा एक बार चटका लगाएँ


आप का एक छोटा सा प्रयास आपको एक सच्चा प्रहरी बनायेगा

sanu shukla said...

बेहतरीन प्रस्तुति ,उम्दा रचना ..!!