कुनमुनी रातें
अलाव सिकी यादें,
कुलमुलाती हैं
सखी की बातें
ठौर-ठौर पिये
चाँदनी का दोना लिये,
मढ़ती रात
तारों के धागे लिये
पोरों पर कसती
रानी कहानी रचती,
सूखी पीली पत्ती
अम्बर पर लिखती
मन गुंथी सांझ
झर गए पात-पात,
गुलाबी पतझड़ जाए
सखी घर याद आए।
Tuesday, December 01, 2009
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7 comments:
गुलाबी पतझड़ जाए
सखी घर याद आए।
बहुत सुन्दर
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मन प्रसन्न हो गया जी यह कविता पढ़कर
आजकल कुछ अच्छी कवितायेँ पढ़ीं हैं जिनमें यह भी एक है.
ओह!!!! बहुत ही खूबसूरत रचना । बहुत सुन्दर……
बहुत सुन्दर...पसंद आई.
पोरों पर कसती
रानी कहानी रचती,
सूखी पीली पत्ती
अम्बर पर लिखती
बहुत सुन्दर लिखा है आपने
Simply beautiful Rajni-ji!
कुनमुनी रातें
अलाव सिकी यादें,
ठौर-ठौर पिये
चाँदनी का दोना लिये,
मन गुंथी सांझ
I especially loved these expressions!
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