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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Friday, January 18, 2008

प्रार्थना

धूप में लिपटी एक प्रार्थना,
कुछ चुप, कुछ कहती हुई,
दूब के साथ उग रही थी।
मेरी कोट की जेब में
भूली हुई मेवा की तरह
अंगुलियों में कुलमुला रही थी।

मुट्ठी में भर कर,
मन में कुछ बुदबुदा कर,
फूँक मारी थी।

तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में
गुम हुई खामोशी बता रही है,
शायद वो दुआ तुम तक पहुँची है।

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6 Comments:

Blogger DR.ANURAG ARYA said...

कुछ चुप, कुछ कहती हुई,
दूब के साथ उग रही थी।
मेरी कोट की जेब में
भूली हुई मेवा की तरह
अंगुलियों में कुलमुला रही थी।

rajni ji.....ye lines dil me ab bhi atki hui hai.
umeed hai aage aor achha likhti rahegi.

5:45 AM  
Blogger रजनी भार्गव said...

अनुराग जी ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद.

6:44 AM  
Blogger जोशिम said...

जाड़े में धूप सी प्रार्थना - शांत संक्षिप्त गहरी - बहुत खूब - rgds- मनीष

10:59 AM  
Blogger Poonam said...

शान्त सी एक प्रार्थना ने दिल को छू लिया

12:02 AM  
Blogger विनय प्रजापति 'नज़र' said...

रोज़मर्रा की चीज़ों से चाट बनाते हैं और नज़्म बुन रही हैं, वाह क्या सलाइयाँ है सोच और शब्द!

6:16 AM  
Blogger महेन्द्र मिश्र said...

सुना था कि ज़रूर पहुंचती है दिल से की गई प्रार्थना..और आज आपके शब्दों मे देख भी लिया..

11:41 PM  

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