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Name: रजनी भार्गव
Location: Plainsboro, New Jersey, United States

किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं

Tuesday, December 19, 2006

नव वर्ष

नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार,

जब राह के पँछी घर को लौटें,
जब पेड़ के पत्ते झर-झर जाएँ,
जब आकाश ठँड का कोहरा ओढ़े,
आँखों के पानी से लिखी पाती मिल जाए,
एक उजले स्वप्न सा आँखों में भर लेना,
आँखों की नमी से मुझको भिगो देना ।

नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार ,

जब फ़सल कटने के दिन आयें,
धान के ढेर लगे हों घर द्वार ,
लोढ़ी, संक्राति और पोंगल लाये पके धान की बयार,
बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार,
तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना,
मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना ।

नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार,

जब भी भीड़ में चलते-चलते कोई पुकारे मुझे
और मैं पीछे मुड़ कर देखूँ ,
तुम मेरे कंधे पर हाथ रख कर,
कानों में चुपके से कुछ कह कर,
थोड़ी देर के लिये अपना साथ दे जाना,
भीड़ के एकाकीपन में अपना परिचय दे जाना ।

नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार.

8 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

बहुत खुबसूरत. न जाने क्यूँ, शायद तर्ज की वजह से, कविता पढ़ते पढ़ते माखन लाल चतुर्वेदी जी की कविता 'पुष्प की अभिलाषा' की याद आ गई.

-बधाई

3:53 AM  
Blogger Upasthit said...

Nav varsh ke panne kore kyon hain. Prashna hai jiska uttar is avyavasthti vyavastha ya jaisa ki shailesh bharatvasi kahte hain antheen abhisht, bas vaisa hi hai. Badi khushiyan bade parv kahin choti khushiyon ko daba kar to nahi manaaye ja rahe, Teej prakash me chundhiyayi ankhon ki tarah.
Shayas main kavita se jud nahi paaya par "bheed ke ekaakipan me apna parichay" bas thodi der ke liye hi kyun, ye bhay hai ya atma mugdhata ya akele rah kar jeene ki niyati.
Kavia kyon achchi lagi iske liye "udan tashtari" ji ki tarah mere paas bhi koi karan nahi...(ho sakta hai palle hi na padi ho)

11:41 AM  
Blogger रजनी भार्गव said...

उपस्थित जी,जो भाव मन में आए वो पन्नों पर उतर गए, इतनी गहराई से शायद नहीं सोचा. आपने कविता टिप्पणी के लायक समझी उसकी आभारी हूँ.
समीर जी आपका हमेशा की तरह प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए धन्यवाद,
रजनी

4:52 AM  
Blogger ranju said...

जब भी भीड़ में चलते-चलते कोई पुकारे मुझे
और मैं पीछे मुड़ कर देखूँ ,
तुम मेरे कंधे पर हाथ रख कर,
कानों में चुपके से कुछ कह कर,
थोड़ी देर के लिये अपना साथ दे जाना,
भीड़ के एकाकीपन में अपना परिचय दे जाना ।


रज़नी जी इतना सुंदर लिखा है आपने की बस पढ़ती रह गयी ...बहुत ही सुंदर रचना है यह आपकी

ranju

9:33 PM  
Blogger Beji said...

थोड़ी देर से आई हूँ....
हमेशा की तरह बहुत सुन्दर

9:04 PM  
Blogger sanjeev sameer said...

bahut achcha, aapki kavita padhkar lambe arse ke baad phir se kavita likhne baith raha hun.
-sanjeev sameer, jharkhand

6:14 AM  
Blogger sanjeev sameer said...

bahut achcha. aapki kavita padhkar phir se kavita likhne baith gaya.
- sanjeev sameer, jharkhand

6:18 AM  
Blogger रजनी भार्गव said...

बेजी, रंजू,धन्यवाद और संजीव जी अगर मैं किसी
को प्रेरित कर पाई कविता लिखने के लिये तो ये मेरी सफ़लता समझिये.धन्यवाद.

10:37 AM  

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