Sunday, November 19, 2006

जाते पतझड़ की शाम ...



हर मौसम अपनी अनूठी शामें और सुबह ले आता है. पतझड़ भी यहाँ आया और अब जा रहा है. जाते-जाते आगाह कर गया कि कोने पर ही शरद खड़ा है जो आने वाला है.

कनाडा और अमरीका में पतझड़ अपने साथ रँगों की इतनी बौछार ले आता है कि ऐसा लगता है जैसे भगवान फ़ुर्सत से बैठ कर कैन्वस पर तूलिका से रँगों का मजमा लगा रहें हैं । जैसे-जैसे दिन छोटे और रातें लम्बी होने लगती हैं, वैसे-वैसे पत्तियों के रँग बदलने लगते हैं. हरे रँग की पत्तियाँ लाल, पीली भूरी,सुनहरी हो जाती हैं. यह मेपल, ओक,हिकोरी,डागवुड, ऐश, पोपलर आदि वृक्षॊं मॆं पाया जाता है. पतझड़ को यहाँ fall कहते हैं. Fall Colors कितने गहरे या कितने फ़ीके होंगे वो मौसम, तापमान,बारिश जैसे कारणों पर निर्भर करता है.

आज मैं बैठी क्षितिज पर डूबते सूरज की भाव-भंगिमा को निहार रही थी. लग रहा था सूरज आज पत्तियॊं में कैद हो गया है, वो भी जाने को राज़ी नहीं था. मैं अपने कुत्ते 'विंसटन' के साथ बैठी सूरज की कशिश देख रही थी. हमारे कुत्ते का नाम विंसटन है पर विंसटल चर्चिल जैसे कोई गुण नहीं हैं. नाम हमारे बेटे और बिटिया नें सर्वसम्मति से रखा और हम दोनों का उस में कोई हाथ नहीं था । कुछ दूर पर एक गिलहरी को चीड़ के वृक्ष से गिरा 'पाइन कोन' मिल गया था, उसी को ले कर कुट-कुट कर रही थी. गिलहरी यहाँ पर ज़्यादातर मटमैली होती हैं. भारत में जो देखीं हैं थोड़े और हल्के रँग की होती हैं और पूँछ पर तीन धारियाँ होती हैं. विंसटन जो गिलहरी को कोन खाते देख रहा था उस की ओर लपकने के लिए तैयार बैठा था, अब राजनीतिज्ञ जैसे कोई गुण होते तो उसे पहले पटाता और फ़िर 'कोन' खोंस लेता.

हल्की सी खुनक हवा में बस रही थी. मुझे अंदर जाने के लिए बाध्य कर रही थी. आकाश में पक्षियों का झुण्ड अपने नीड़ की ओर जा रहा था. हरी घास पर बिछी लाल, पीली पत्ति्याँ लोटने के लिए निमंत्रण दे रहीं थी. ठँड से बचने के लिए मैं अपने को अपनी ही बाँहों के घेरे में कसती जा रही थी. हार कर अन्दर जाने के लिए उठी, कुछ लाल पीली पत्तियाँ मुट्ठी में बँद कर के पतझड़ को मन में अंकित करना चाह रही थी. विंसटन भी कुछ सूखे पत्ते अपने से चिपकाए पतझड़ को घर में ले आया. ये पत्ते कुछ दिन बाद सूख कर झीने हो जाएँगे पर कुछ दिन के लिए ये मौसम और ये रँग-बिरँगी पत्तियाँ साथ रह जाएँगी.

8 comments:

संजय बेंगाणी said...

सुन्दर विवरण. पढ़ते समय लगा, कविता पढ़ रहा हूँ.

Beji said...

"विंसटन भी कुछ सूखे पत्ते अपने से चिपकाए पतझड़ को घर में ले आया."
कैसे कैसे मौसम घर आ जाते हैं!!

पढ़कर ऐसा लगा जैसे रंगबिरंगा पतझड़ मेरी कल्पना में भी अटक गया।

Beji said...

आपकी कवितायें पढ़ी....
आपकी कवितायें शब्दों पर बिठाकर भावों के समन्दर के बीच ले जाती हैं.... डूब जाने का डर है!!

Udan Tashtari said...

पतझड़ के मौसम पर लिखा आपका लेख बिल्कुल काव्यात्मक है. वैसे तो हिन्दी के ब्लाग में अंग्रेजी की कविता लिखना नहीं चाह रहा था, मगर आपका लेख पढ़कर रुका भी नहीं जा रहा है. सोचता हूँ शायद इस बात से माफी मिल जायेगी कि भाव भाषा के मोहताज नहीं और बस भाव होते हैं. काफी पहले की पढ़ी कविता है, मगर इसके रचयिता का नाम मुझे ज्ञात नहीं:


Leaves are falling all around,
Make a "crunch" upon the ground;
Orange and yellow, green and red,
Change their colors when you're in bed.

Many people, so they say,
Like their colors in disarray;
Red and yellow, orange and green,
Make a lovely color scheme.

On the tree are many colors,
But on the ground
Are their brown brothers;
Green and red, orange and yellow,
Really do amaze a fellow.

Pratik said...

पतझड़ के मौसम का यह ख़ूबसूरत विवरण उस खुनक और रंगों को उतनी ही शिद्दत से यहाँ भी महसूस करा रहा है। शुक्रिया।

भुवनेश शर्मा said...

आपका लेख पढ़कर लगा कि कविता को गद्य रूप में परिवर्तित कर दिया गया हो, पर उसकी सुंदरता और अधिक बढ़ गई हो।
बहुत अच्छा लगा
धन्यवाद

रजनी भार्गव said...

संजय जी, बेजी जी, समीर जी, प्रतीक जी,भुवनेश
जी, आप सब को मेरा लेख अच्छा लगा उसके लिए
बहुत-बहुत धन्यवाद,

रजनी

priyankar said...

कविता की कांति लिये सुंदर और भावपूर्ण गद्य, वह भी सुंदरतर तस्वीर के साथ . अभिभूत हूं .