मैं नानाजी की टोपी,
चाँद की किरण से सीती थी।
अंदर से टोपी उधड़ गई थी।
उम्र में बड़ी हो गई थी।
थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी।
जब तागे निकल जाते थे तो
झूमर से लहराते थी।
बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे।
टोपी अब भी पुख्ता थी।
ऐसे लगता था जैसे कोई मनौती हो,
दुआ सी असर करती थी।
नानाजी को ठंड से बचाए रखती थी।
चाँद की किरण तिलस्मी होती है,
अम्बर की परी नानाजी की सहेली होती थी।
टोपी जब ठीक हो जाती थी
ढेरों आशीषों की बरसात होती थी।
नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,
मेरे पास आशीषों की बरसात।
_____________________
Tuesday, September 02, 2008
Monday, June 02, 2008
आकांक्षा
आकाश को कितनी ही बार
अपने हाथों में ले कर
दूधिया बादल से नहाई हूँ मैं,
आकांक्षाओं को कई बार
अपनी आँखों में संजो कर
रंग भरी पिचकारी सी छूटी हूँ मैं,
और फिर,
गुलमोहर की तरह गर्व से
तुम पर बिखर गई हूँ मैं,
क्षितिज का प्रथम पहरेदार
आकाश में वो जो ध्रुव तारा है,
उसे तुम्हे सौंप कर
रात में चाँदनी बन कर छिटक गई हूँ मैं
तुम जानो या न जानो
अहसासों के इस गुलदान में
बादलों से नहाई हूँ,
रंगों से भीगी हूँ,
चाँदनी सी छिटकी हूँ,
और इन्ही खूबसूरत अहसासों से,
संदली हवा की तरह
महक गई हूँ मैं।
अपने हाथों में ले कर
दूधिया बादल से नहाई हूँ मैं,
आकांक्षाओं को कई बार
अपनी आँखों में संजो कर
रंग भरी पिचकारी सी छूटी हूँ मैं,
और फिर,
गुलमोहर की तरह गर्व से
तुम पर बिखर गई हूँ मैं,
क्षितिज का प्रथम पहरेदार
आकाश में वो जो ध्रुव तारा है,
उसे तुम्हे सौंप कर
रात में चाँदनी बन कर छिटक गई हूँ मैं
तुम जानो या न जानो
अहसासों के इस गुलदान में
बादलों से नहाई हूँ,
रंगों से भीगी हूँ,
चाँदनी सी छिटकी हूँ,
और इन्ही खूबसूरत अहसासों से,
संदली हवा की तरह
महक गई हूँ मैं।
Wednesday, May 21, 2008
सभ्यता
ज़िन्दगी के पलों को
गुणा, भाग कर ,
घटा, जोड़ कर ,
बहा दिया था नदी में एक दिन मैने ।
नदी -
जो ज़मीन के नीचे,
पुरखों के पांव तले
और मेरे पाँव के नीचे भी
बहती रही है सदियों से ।
मैं देखती हूँ
कि उभर आये हैं भित्तिचित्र
नदी के मुहाने पर ।
और...
ये भी देख रही हूँ मैं
कि इतिहास के संदर्भों की दरारों में
ठहर गया है पानी,
और इसी पानी में
खिल गये हैं कमल के फ़ूल ।
चकित हूँ मैं
इस दृश्य को देख कर
कि इसी नदी के मुहाने पर
किलकारी ले रही है नई सभ्यता
ठीक ऐसे ही
जैसे हँसता है नवजात शिशु
माँ की गोद में आकर । ....
गुणा, भाग कर ,
घटा, जोड़ कर ,
बहा दिया था नदी में एक दिन मैने ।
नदी -
जो ज़मीन के नीचे,
पुरखों के पांव तले
और मेरे पाँव के नीचे भी
बहती रही है सदियों से ।
मैं देखती हूँ
कि उभर आये हैं भित्तिचित्र
नदी के मुहाने पर ।
और...
ये भी देख रही हूँ मैं
कि इतिहास के संदर्भों की दरारों में
ठहर गया है पानी,
और इसी पानी में
खिल गये हैं कमल के फ़ूल ।
चकित हूँ मैं
इस दृश्य को देख कर
कि इसी नदी के मुहाने पर
किलकारी ले रही है नई सभ्यता
ठीक ऐसे ही
जैसे हँसता है नवजात शिशु
माँ की गोद में आकर । ....
Friday, May 16, 2008
मेरे अपने सपने
मेरे सपने मेरे अपने हैं,
कोई भी इस हाशिए पर लिखे
ये फ़िर भी मेरे अपने हैं.
मौजों पर सवार ये तख्ती,
बहुत थपेड़े सहती है.
क्षितिज तक पहुँचने की चाह में
खुद ही मीलों तक बहती है.
_________________
कोई भी इस हाशिए पर लिखे
ये फ़िर भी मेरे अपने हैं.
मौजों पर सवार ये तख्ती,
बहुत थपेड़े सहती है.
क्षितिज तक पहुँचने की चाह में
खुद ही मीलों तक बहती है.
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Friday, March 21, 2008
होली- कुछ चित्र
खुलते जाते सब गठबँधन
आसमान से हटते पहरे
जब से फागुन ले कर आया
पीत पराग रँग कुछ गहरे।
---
पीली हल्दी, सजी किनारी
खिली धूप की चादर ओढ़ी
आँगन पूरा हरसिंगार सा
और वसंत खड़ी है ड्योढ़ी।
---
पच पच पच करती पिचकारी
रँगों की बहती फुलवारी
मल गुलाल सिहरी दोपहरी
मेघों का सुन गर्जन भारी
---
आँगन में फ़ैली है किच-पिच
रंग सुनहरे, चूनर गीली
सूर्य किरण अब उन्हें सोख के
खेल रही गलियों में होली।
______________
होली की शुभकामनाओं सहित
आसमान से हटते पहरे
जब से फागुन ले कर आया
पीत पराग रँग कुछ गहरे।
---
पीली हल्दी, सजी किनारी
खिली धूप की चादर ओढ़ी
आँगन पूरा हरसिंगार सा
और वसंत खड़ी है ड्योढ़ी।
---
पच पच पच करती पिचकारी
रँगों की बहती फुलवारी
मल गुलाल सिहरी दोपहरी
मेघों का सुन गर्जन भारी
---
आँगन में फ़ैली है किच-पिच
रंग सुनहरे, चूनर गीली
सूर्य किरण अब उन्हें सोख के
खेल रही गलियों में होली।
______________
होली की शुभकामनाओं सहित
Thursday, February 07, 2008
सवाल
वो पल वहीं ठहर गया था,
जिस पल खिड़की से छनती धूप ने,
तुम्हे हताश और निढाल पाया था,
मेरी आँखों से कुछ सवाल करते पाया था।
वो सवाल अभी भी उघड़े पड़े हैं,
उस पोस्टकार्ड की तरह जो आया था
पहाड़ियों की बर्फ से भीग कर,
दराज़ में अब भी पड़ा है
कुछ सिकुड़ा हुआ।
चलो,
अब हताश लकीरों को ताक पर रख दें,
एक नए पोस्टकार्ड पर ट्यूलिप्स और क्रोकस बनाते हैं,
बसंत को बुलाते हैं,
कुछ बादल छँट जाएँगे,
तुम्हे मेरे कुछ जवाब मिल जाएँगे|
__________________
जिस पल खिड़की से छनती धूप ने,
तुम्हे हताश और निढाल पाया था,
मेरी आँखों से कुछ सवाल करते पाया था।
वो सवाल अभी भी उघड़े पड़े हैं,
उस पोस्टकार्ड की तरह जो आया था
पहाड़ियों की बर्फ से भीग कर,
दराज़ में अब भी पड़ा है
कुछ सिकुड़ा हुआ।
चलो,
अब हताश लकीरों को ताक पर रख दें,
एक नए पोस्टकार्ड पर ट्यूलिप्स और क्रोकस बनाते हैं,
बसंत को बुलाते हैं,
कुछ बादल छँट जाएँगे,
तुम्हे मेरे कुछ जवाब मिल जाएँगे|
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Friday, January 18, 2008
प्रार्थना
धूप में लिपटी एक प्रार्थना,
कुछ चुप, कुछ कहती हुई,
दूब के साथ उग रही थी।
मेरी कोट की जेब में
भूली हुई मेवा की तरह
अंगुलियों में कुलमुला रही थी।
मुट्ठी में भर कर,
मन में कुछ बुदबुदा कर,
फूँक मारी थी।
तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में
गुम हुई खामोशी बता रही है,
शायद वो दुआ तुम तक पहुँची है।
__________________
कुछ चुप, कुछ कहती हुई,
दूब के साथ उग रही थी।
मेरी कोट की जेब में
भूली हुई मेवा की तरह
अंगुलियों में कुलमुला रही थी।
मुट्ठी में भर कर,
मन में कुछ बुदबुदा कर,
फूँक मारी थी।
तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में
गुम हुई खामोशी बता रही है,
शायद वो दुआ तुम तक पहुँची है।
__________________
Monday, January 14, 2008
चेतना के फूल
कमरे में थी एक मेज़,
दो कुर्सियाँ,
सीलिंग से लटके लैम्प की
रोशनी गोल सीमित दायरे में.
उससे परे थे कुछ साए,
खिड़की में रखे गमले के,
कांउटर पर कप और प्लेट के,
खूँटी पर टँगे कपड़ों के.
समय के सन्नाटे में,
झाँक रहा था सूरज का एक टुकड़ा,
आधा मेज़ पर और आधा फ़र्श पर लेटा हुआ,
धीरे-धीरे फ़र्श पर उतरते हुए
रह गई थी अब एक लकीर
जो घुल-मिल गई थी मेरी हाथ की लकीरों से,
चेतना के फूल खिल गए थे इस जज़ीरे पर।
समय के गठबँधन खुल गए थे किनारे पर।
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दो कुर्सियाँ,
सीलिंग से लटके लैम्प की
रोशनी गोल सीमित दायरे में.
उससे परे थे कुछ साए,
खिड़की में रखे गमले के,
कांउटर पर कप और प्लेट के,
खूँटी पर टँगे कपड़ों के.
समय के सन्नाटे में,
झाँक रहा था सूरज का एक टुकड़ा,
आधा मेज़ पर और आधा फ़र्श पर लेटा हुआ,
धीरे-धीरे फ़र्श पर उतरते हुए
रह गई थी अब एक लकीर
जो घुल-मिल गई थी मेरी हाथ की लकीरों से,
चेतना के फूल खिल गए थे इस जज़ीरे पर।
समय के गठबँधन खुल गए थे किनारे पर।
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Wednesday, January 09, 2008
नया साल
आया नया साल
ढलते दिन के साथ,
साँसे बह चली,
लिये नूतन दिवस के पराग।
आया नया साल
बदलती तिथि के साथ,
अहसासों की गिलौरी में
बस गई है मीठी आस
आया नया साल
पुराने दिनों के साथ
आस्था की मौली बाँधी,
नए सूर्योदय के साथ।
आया नया साल
गुज़रते सपनों के साथ,
खुरदरे समय पर लिखी
तराशी हुई कहानियाँ आज।
_________________
ढलते दिन के साथ,
साँसे बह चली,
लिये नूतन दिवस के पराग।
आया नया साल
बदलती तिथि के साथ,
अहसासों की गिलौरी में
बस गई है मीठी आस
आया नया साल
पुराने दिनों के साथ
आस्था की मौली बाँधी,
नए सूर्योदय के साथ।
आया नया साल
गुज़रते सपनों के साथ,
खुरदरे समय पर लिखी
तराशी हुई कहानियाँ आज।
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Monday, December 10, 2007
बिखरे खत
कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं,
कुछ उत्तरी दिशा में देवदारों पर अटक गए,
कुछ दक्षिण दिशा में संदल बन में भटक गए.
दरवाज़े की ओट में किसी की नज़र में रह गए,
किसी राह में साँझ के साथ डूबते चले गए,
तुम्हारे साथ चलते हुए कुछ लिखे गए
पर टूटे माणिक से हर जगह बिखर गए,
आरज़ू बीनते हुए मन के हर पृष्ठ पर लिखे
पर कुछ मन की बारिश में भीगते हुए यूँ ही धुल गए,
कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं।
______________________
कुछ उत्तरी दिशा में देवदारों पर अटक गए,
कुछ दक्षिण दिशा में संदल बन में भटक गए.
दरवाज़े की ओट में किसी की नज़र में रह गए,
किसी राह में साँझ के साथ डूबते चले गए,
तुम्हारे साथ चलते हुए कुछ लिखे गए
पर टूटे माणिक से हर जगह बिखर गए,
आरज़ू बीनते हुए मन के हर पृष्ठ पर लिखे
पर कुछ मन की बारिश में भीगते हुए यूँ ही धुल गए,
कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं।
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Monday, December 03, 2007
अम्मा की रसोई
अम्मा की रसोई में
सुबह शाम जलता चूल्हा,
बच्चों का उपर नीचे कूदना,
किसी का झिड़की खाना
तो किसी का आंचल में छुप जाना,
दिन गुज़रता था ऐसे
हर पल सँवरता हो जैसे।
कितने प्रश्न अम्मा के सामने जा बैठते थे,
अम्मा उन्हें हर कोने से उठा कर
तरतीब से लगाती थी,
जैसे अँगीठी में जलते कोयलों को
अँगुलियों से ठीक तरह लगाती हों।
दिन भर प्रश्नों से जूझना,
साँझ ढले उन्हे गोद में ले कर सो जाना,
अम्मा ने भेद लिया था संसार का सार,
सृष्टि का किया था नव निर्माण।
रूढियों में बँध कर पाला था ये संसार,
जो रोपा था दहलीज़ के इस पार,
बाँट दी धरोहर आज सब उस पार।
_____________________
सुबह शाम जलता चूल्हा,
बच्चों का उपर नीचे कूदना,
किसी का झिड़की खाना
तो किसी का आंचल में छुप जाना,
दिन गुज़रता था ऐसे
हर पल सँवरता हो जैसे।
कितने प्रश्न अम्मा के सामने जा बैठते थे,
अम्मा उन्हें हर कोने से उठा कर
तरतीब से लगाती थी,
जैसे अँगीठी में जलते कोयलों को
अँगुलियों से ठीक तरह लगाती हों।
दिन भर प्रश्नों से जूझना,
साँझ ढले उन्हे गोद में ले कर सो जाना,
अम्मा ने भेद लिया था संसार का सार,
सृष्टि का किया था नव निर्माण।
रूढियों में बँध कर पाला था ये संसार,
जो रोपा था दहलीज़ के इस पार,
बाँट दी धरोहर आज सब उस पार।
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Sunday, October 14, 2007
युग
तुम्हारी याद में एक युग समाया है,
गुज़रता है तो पुरवाई बन साँसों में समा जाता है,
हर राह सरल पगडंडी बन जाती है
जंगल की बीहड़ वीरानियाँ किनारे पर रह जाती है,
नागफ़नी पर ओस की बूँदें,
बादल बन धूप में घुल जाती हैं,
तुम्हारी आँखों की लकीरें हँसती हुई,
मेरे को तकती हैं
अनवरत कदमो से बढ़ती हुई,
मेरी हँसी को छूती हैं,
पिघलती यादें फ़िर से
एक युग में बहती हैं।
गुज़रता है तो पुरवाई बन साँसों में समा जाता है,
हर राह सरल पगडंडी बन जाती है
जंगल की बीहड़ वीरानियाँ किनारे पर रह जाती है,
नागफ़नी पर ओस की बूँदें,
बादल बन धूप में घुल जाती हैं,
तुम्हारी आँखों की लकीरें हँसती हुई,
मेरे को तकती हैं
अनवरत कदमो से बढ़ती हुई,
मेरी हँसी को छूती हैं,
पिघलती यादें फ़िर से
एक युग में बहती हैं।
Tuesday, September 18, 2007
रात की कहानी
सुराही से रिसता पानी
छत की मुँडेर के पास ठहर गया था।
रात ने चाँद को सकोरे में उड़ेल कर
मुझे दिया था।
मैं अँजुरी में चाँद भर रही थी।
अँगुलियों से रिसती चाँदनी
अँजुरी में मावस भर रही थी।
सोच रही थी,
जब दूज का चाँद निकलेगा
तो अँजुरी फ़िर भरूँगी।
तुमसे रात की कहानी फ़िर
सुनूँगी।
छत की मुँडेर के पास ठहर गया था।
रात ने चाँद को सकोरे में उड़ेल कर
मुझे दिया था।
मैं अँजुरी में चाँद भर रही थी।
अँगुलियों से रिसती चाँदनी
अँजुरी में मावस भर रही थी।
सोच रही थी,
जब दूज का चाँद निकलेगा
तो अँजुरी फ़िर भरूँगी।
तुमसे रात की कहानी फ़िर
सुनूँगी।
Thursday, September 06, 2007
क्लैडिस्कोप
कल रात मुझसे लिपट कर
सोई थी एक गज़ल,
सुबह अशआर टिके थे अम्बर पर,
दर्द टिका था कोरों पर,
खनखनाती और रँग बिरँगी किरचों से
उभर आए हैं नए आयाम.
अनजाने अहसास से एक क्लैडिस्कोप
बना लाई है शाम ।
_____________
सोई थी एक गज़ल,
सुबह अशआर टिके थे अम्बर पर,
दर्द टिका था कोरों पर,
खनखनाती और रँग बिरँगी किरचों से
उभर आए हैं नए आयाम.
अनजाने अहसास से एक क्लैडिस्कोप
बना लाई है शाम ।
_____________
Monday, September 03, 2007
अमलतास
जेठ की दुपहरी में
अलसाई धूप को लपेटे,
अमलतास लेता है अँगड़ाई,
मैं सिहर जाती हूँ,
छू जाती है जब ठँडी पुरवाई.
सूरज की किरणें जब पीले गुँचों में
नज़र आती हैं.
आँखों में फ़िरकनी घूम जाती है.
गुम दोपहरी में मैं,
पीले सूखे फूल मुट्ठी में भर कर,
बाबा को दे आती थी,
बाबा फ़ूँक मारते थे तो
हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती थीं.
अमलतास के गले लग कर
हम अपनी बाँहों का घेरा नापते थे,
मेरा घेरा बढ़ता रहता था पर
बाबा का घेरा नहीं बढ़ता था.
मैं इंतज़ार करती रही कि
बाबा का घेरा कब बढ़ेगा.
घर के अहाते में आज
मेरे बिटिया की मुट्ठी में पीले सूखे फूल हैं,
फ़ूँक मारो तो हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती हैं.
मेरा घेरा लेकिन अब नहीं बढ़ता,
लगता है अमलतास भी उतना का उतना ही है ।
अलसाई धूप को लपेटे,
अमलतास लेता है अँगड़ाई,
मैं सिहर जाती हूँ,
छू जाती है जब ठँडी पुरवाई.
सूरज की किरणें जब पीले गुँचों में
नज़र आती हैं.
आँखों में फ़िरकनी घूम जाती है.
गुम दोपहरी में मैं,
पीले सूखे फूल मुट्ठी में भर कर,
बाबा को दे आती थी,
बाबा फ़ूँक मारते थे तो
हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती थीं.
अमलतास के गले लग कर
हम अपनी बाँहों का घेरा नापते थे,
मेरा घेरा बढ़ता रहता था पर
बाबा का घेरा नहीं बढ़ता था.
मैं इंतज़ार करती रही कि
बाबा का घेरा कब बढ़ेगा.
घर के अहाते में आज
मेरे बिटिया की मुट्ठी में पीले सूखे फूल हैं,
फ़ूँक मारो तो हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती हैं.
मेरा घेरा लेकिन अब नहीं बढ़ता,
लगता है अमलतास भी उतना का उतना ही है ।
Friday, August 17, 2007
मौन प्रतीक
साँझ के रँगों में
उदय होता वो पहला तारा,
मेरी आँखों में तैर रहा था,
रात भर सपनों में गूँथा,
सुबह आँख के कोरों से बह गया था,
सिरहाने सिर्फ़ उसका अहसास था,
भूलते हुए स्वप्न का
वह मौन प्रतीक था.
उदय होता वो पहला तारा,
मेरी आँखों में तैर रहा था,
रात भर सपनों में गूँथा,
सुबह आँख के कोरों से बह गया था,
सिरहाने सिर्फ़ उसका अहसास था,
भूलते हुए स्वप्न का
वह मौन प्रतीक था.
Tuesday, July 31, 2007
पल की बरसात
बारिश बरसी गली चौबारे,
ऐसी बरसी पाँव पसारे,
लोग गीले, भीगे,
ढूँढने चले छ्प्पर किनारे.
चिड़िया भीगी पेड़ पर,
घने पत्तों के नीचे टहनी पर
चुहक-चुहक कर
गुस्सा करती सावन पर.
चौराहा, आँगन और चौपाल
धुले हैं ज्यों आज,
झाड़ू बुहार दी हो जैसे
आगुंतक के आने की खुशी में आज.
प्यासा गुलमोहर और अमलतास
तृप्त हुआ बौछारों से आज,
कहा, ठहर जाओ,
सजी है सेज लाल पीले फूलों से आज.
सुन लिया जैसे सावन ने
धनक के रँग घोल दिए नभ में,
तूलिका को ले कर
साँझ को सिन्दूरी किया पल में.
बारिश बरसी पल दो पल,
मैं सूखी भिगो रही थी पल,
तुम्हारे हाथ को थामें
सावन से मोती चुरा रही थी कल.
_____________________
ऐसी बरसी पाँव पसारे,
लोग गीले, भीगे,
ढूँढने चले छ्प्पर किनारे.
चिड़िया भीगी पेड़ पर,
घने पत्तों के नीचे टहनी पर
चुहक-चुहक कर
गुस्सा करती सावन पर.
चौराहा, आँगन और चौपाल
धुले हैं ज्यों आज,
झाड़ू बुहार दी हो जैसे
आगुंतक के आने की खुशी में आज.
प्यासा गुलमोहर और अमलतास
तृप्त हुआ बौछारों से आज,
कहा, ठहर जाओ,
सजी है सेज लाल पीले फूलों से आज.
सुन लिया जैसे सावन ने
धनक के रँग घोल दिए नभ में,
तूलिका को ले कर
साँझ को सिन्दूरी किया पल में.
बारिश बरसी पल दो पल,
मैं सूखी भिगो रही थी पल,
तुम्हारे हाथ को थामें
सावन से मोती चुरा रही थी कल.
_____________________
Sunday, July 22, 2007
उम्मीद
उम्मीद आसुँओं में बसी रहती है
बहती हुई यूँ हीं सफ़र तय करती है
मन में बेचैनी घनी धुँध सी रहती है
कोहरा छटे तो अजब तपिश सी लगती है
तुम जब लौट-लौट कर आते हो
ज़िन्दगी अध्यायों में बँटी लगती है
अक्षर जब तुम्हारा अनुसरण करते हैं
तुमसे लिखी हुई कहानी अच्छी लगती है
साँझ के काले साए जब और गहरे होते हैं
उससे रची भोर की अरूणिमा सुन्दर लगती है.
बहती हुई यूँ हीं सफ़र तय करती है
मन में बेचैनी घनी धुँध सी रहती है
कोहरा छटे तो अजब तपिश सी लगती है
तुम जब लौट-लौट कर आते हो
ज़िन्दगी अध्यायों में बँटी लगती है
अक्षर जब तुम्हारा अनुसरण करते हैं
तुमसे लिखी हुई कहानी अच्छी लगती है
साँझ के काले साए जब और गहरे होते हैं
उससे रची भोर की अरूणिमा सुन्दर लगती है.
Sunday, April 22, 2007
आवरण
मुझसे मेरा परिचय करा दो
पेड़ की छाल से मेरा आवरण हटा दो
एक नवअंकुरित पौध
मिट्टी को खगाल
अभी-अभी फूटी है,
लचीली, कच्ची टहनी
नभ को छूने उठी है,
प्रभात की वेला में
गरमाहट उसको मिली है,
अमराई में चमकती हुई
मकड़ी के जालों सी खिली है
इससे पहले की वो बड़ी हो
परत दर परत गठे,
उस नवअंकुरित अहसास को
हवा में उड़ा दो,
मेरे पोर-पोर में बसा दो,
उनसे उपजित क्षणों को
कोई सुरभित संज्ञा दे दो,
मुझसे मेरा परिचय करा दो ।
पेड़ की छाल से मेरा आवरण हटा दो
एक नवअंकुरित पौध
मिट्टी को खगाल
अभी-अभी फूटी है,
लचीली, कच्ची टहनी
नभ को छूने उठी है,
प्रभात की वेला में
गरमाहट उसको मिली है,
अमराई में चमकती हुई
मकड़ी के जालों सी खिली है
इससे पहले की वो बड़ी हो
परत दर परत गठे,
उस नवअंकुरित अहसास को
हवा में उड़ा दो,
मेरे पोर-पोर में बसा दो,
उनसे उपजित क्षणों को
कोई सुरभित संज्ञा दे दो,
मुझसे मेरा परिचय करा दो ।
Monday, April 02, 2007
बसंत
बसंत चली आई,
अधमुँदीं पलकों में,
कुछ तस्वीरों को ले कर.
एक कोलाज उभर कर आया है,
कुछ कच्ची कलियाँ हैं शाखों पर,
हरी दूब और उसके बीच में हैं कुछ डैफोडिल,
ठंडी हवा के झोंके में सिहरते हैं
नन्ही चिड़िया के पंख.
पीले पराग को हाथों में
लिये मैं रँग रही थी
भोर के प्रतीक्षित क्षणों को,
और तुम,
मेरे उन्हीं क्षणों से
सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे,
मेरे बसंत को आँखों में समेटे हुए
खिलते फूलों का प्रसंग दे रहे थे.
_______________
अधमुँदीं पलकों में,
कुछ तस्वीरों को ले कर.
एक कोलाज उभर कर आया है,
कुछ कच्ची कलियाँ हैं शाखों पर,
हरी दूब और उसके बीच में हैं कुछ डैफोडिल,
ठंडी हवा के झोंके में सिहरते हैं
नन्ही चिड़िया के पंख.
पीले पराग को हाथों में
लिये मैं रँग रही थी
भोर के प्रतीक्षित क्षणों को,
और तुम,
मेरे उन्हीं क्षणों से
सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे,
मेरे बसंत को आँखों में समेटे हुए
खिलते फूलों का प्रसंग दे रहे थे.
_______________
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