मुझको सूरज की किरण दे दो,
आकाश का नीला विस्तार दे दो,
मैं हूँ एक पाखी,
जीने के लिए ऊँची उड़ान दे दो.
मैं अपने कोमल पँखों को फ़ैलाऊँगी
बादलों के साथ बहुत दूर तक जाऊँगी
कोई साथी नहीं होगा,
इस सफ़र के अनंत बिंदु तक जाऊँगी.
पेड़ के नीचे ठंडी हवा जब बहेगी
पलकें बोझिल हो कर उनींदे सपने देखेंगी
कुछ देर सुस्ता कर,
सपनों में पथ के पाथेय को बुला लेंगी.
दूर दराज़ जब राह को तकूँगी
झूले की पींगों से और उपर उड़ूँगी
आसमान को छूती हुई
राह को दो पल में कनक सी चुग लूँगी
_______________________
Tuesday, April 13, 2010
Saturday, March 27, 2010
अनकहे बोल
मेरे मानस में अनमने बोल हैं
मन के क्षितिज पर अनकहे बोल हैं
कहती हैं कहानियाँ
यह मेरे मन के चोर हैं
अनबुझी सांस की पोर हैं
जीवन के प्रवाह के छोर हैं
फिर
सासें क्यों नही आती
जब गुजरती है मेरी छाया
तुम्हारे कदमों से लिपट के
ढलती है मेरी काया
तुम्हारे नयनों मे सिमट के
सोचती है मेरी भाषा
तुम्हारे शब्दों से निखर के।
समय के अवगुंठन
सिन्दूरी क्षितिज की प्रतीक्षा में
जैसे
रेतीले कण लहरों के साथ
हर बार लौट आते हैं
सूरज की परिक्रमा कर
मेरे विराम तुम पर पूर्ण हो जाते हैं
आकाश के विस्तार में तुम्हारे अर्ध सत्य
मेरे सत्य के बोध हो जाते हैं
तुम्हारे जीवन के केन्द्र बिन्दु
मेरे जीवन की परिधि हो जाते हैं
जीवन की अनबुझी सांसों के मौन
मेरे बोल बन जाते हैं ।
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मन के क्षितिज पर अनकहे बोल हैं
कहती हैं कहानियाँ
यह मेरे मन के चोर हैं
अनबुझी सांस की पोर हैं
जीवन के प्रवाह के छोर हैं
फिर
सासें क्यों नही आती
जब गुजरती है मेरी छाया
तुम्हारे कदमों से लिपट के
ढलती है मेरी काया
तुम्हारे नयनों मे सिमट के
सोचती है मेरी भाषा
तुम्हारे शब्दों से निखर के।
समय के अवगुंठन
सिन्दूरी क्षितिज की प्रतीक्षा में
जैसे
रेतीले कण लहरों के साथ
हर बार लौट आते हैं
सूरज की परिक्रमा कर
मेरे विराम तुम पर पूर्ण हो जाते हैं
आकाश के विस्तार में तुम्हारे अर्ध सत्य
मेरे सत्य के बोध हो जाते हैं
तुम्हारे जीवन के केन्द्र बिन्दु
मेरे जीवन की परिधि हो जाते हैं
जीवन की अनबुझी सांसों के मौन
मेरे बोल बन जाते हैं ।
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Tuesday, March 16, 2010
नीम
कागज़ पर कुछ टेढ़ी मेढ़ी लकीरें
नक्शे पर नीली, हरी लकीरें
बच्चों के मन में गढ़ गई थीं,
आज लकीरें सुलग रही थीं
बनती बिगड़ती बटोही सी
भटक रही थीं।
खबर थी,
सीमा को कल मोड़ दिया था
आज पहाड़ के उस पार पहुँचा दिया था
गुड़हल के फूल,
नीम का पेड़,
कल छज्जू मियाँ की खपरैल और
अहाते में बिछी धूप को
समेट कर
खेमे में गाढ़ दिया था।
खेमे से
दूर-दूर तक दिखता है
लकीरों का ताना बाना
क्षितिज, एक नितांत सीमा
जहाँ से सूर्य किरण
थकी हारी अंदर आती है,
खेमे के, वृत में
गुड़हल के फूल
और नीम के बौने पेड़
को सींचती है,
नीम का बौना पेड़
अब पनपता नहीं
ठूँठ सा अब
खेमे में ही रहता है
रोज़ जल जाता है
नीम का पेड़ कट-कट कर
गिर जाता है।
__________________________
नक्शे पर नीली, हरी लकीरें
बच्चों के मन में गढ़ गई थीं,
आज लकीरें सुलग रही थीं
बनती बिगड़ती बटोही सी
भटक रही थीं।
खबर थी,
सीमा को कल मोड़ दिया था
आज पहाड़ के उस पार पहुँचा दिया था
गुड़हल के फूल,
नीम का पेड़,
कल छज्जू मियाँ की खपरैल और
अहाते में बिछी धूप को
समेट कर
खेमे में गाढ़ दिया था।
खेमे से
दूर-दूर तक दिखता है
लकीरों का ताना बाना
क्षितिज, एक नितांत सीमा
जहाँ से सूर्य किरण
थकी हारी अंदर आती है,
खेमे के, वृत में
गुड़हल के फूल
और नीम के बौने पेड़
को सींचती है,
नीम का बौना पेड़
अब पनपता नहीं
ठूँठ सा अब
खेमे में ही रहता है
रोज़ जल जाता है
नीम का पेड़ कट-कट कर
गिर जाता है।
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Friday, March 12, 2010
बात
बातें, बातों और बातों के पीछे
खूबसूरत मंज़र भटकते हैं
खामोश से,
बंद किवाड़ के पीछे
ठाकुर जी से रहते हैं,
हर दिन नए जंगल बनते हैं,
दरदरे जंगल में चीड़ के पेड़
धूप छाँव का खेल खेलते हैं
रेशम के तार जब सिरा ढूँढते हैं
मन से उलझ जाते हैं
शाख पर तब बहुत से
ज्योति पुंज नज़र आते हैं
बारिश की बूँदों सी बातें
टिप-टिप कर के झरती हैं
मेरे अहसास भिगोती हुई
खिलती धूप की प्रतीक्षा करती हैं।
___________________
खूबसूरत मंज़र भटकते हैं
खामोश से,
बंद किवाड़ के पीछे
ठाकुर जी से रहते हैं,
हर दिन नए जंगल बनते हैं,
दरदरे जंगल में चीड़ के पेड़
धूप छाँव का खेल खेलते हैं
रेशम के तार जब सिरा ढूँढते हैं
मन से उलझ जाते हैं
शाख पर तब बहुत से
ज्योति पुंज नज़र आते हैं
बारिश की बूँदों सी बातें
टिप-टिप कर के झरती हैं
मेरे अहसास भिगोती हुई
खिलती धूप की प्रतीक्षा करती हैं।
___________________
Monday, March 01, 2010
पलाश के फूल
कोयल कुहकी
अमुआ महकी
पोखर पीला
सूरज निकला
ले फूलों के कलश कई
ड्योढ़ी फैले
अंगना खेले
नव पल्लव
पक्षी का कलरव
उल्ल्सित बसंत से खेल कई
गुब्बारे फूटे
गुलाल, रंग छूटे
अब गली ढूँढॆ
नुक्कड़ ढूँढे
वह दिवस जब बिखरे थे रंग कई
चौबारे के रंग
घर में हैं बंद
सूखी होली
जाए अबोली
बुलाए दर पर छपे पलाश के फूल कई।
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अमुआ महकी
पोखर पीला
सूरज निकला
ले फूलों के कलश कई
ड्योढ़ी फैले
अंगना खेले
नव पल्लव
पक्षी का कलरव
उल्ल्सित बसंत से खेल कई
गुब्बारे फूटे
गुलाल, रंग छूटे
अब गली ढूँढॆ
नुक्कड़ ढूँढे
वह दिवस जब बिखरे थे रंग कई
चौबारे के रंग
घर में हैं बंद
सूखी होली
जाए अबोली
बुलाए दर पर छपे पलाश के फूल कई।
______________________
Wednesday, February 17, 2010
रोशनी की लकीरें
कुछ दूर रख कर
कुछ फ़ासले से देखा
कागज़ पर उतरते नक्श को
धरती पर उतरती सूरज की छाया
जैसे बदलती हर पहर के रूप
गाढ़े रंग, हल्के रंग
आढ़ी, तिरछी रोशनी की लकीरें
सब उतर गए थे छवि के संग
उन के बीच में थी
वो
उदास आँखें जो
बीन रहीं थी
बसंत में खिले
रोशनी से भरे
सफ़ेद चेरी के फूल।
___________________
कुछ फ़ासले से देखा
कागज़ पर उतरते नक्श को
धरती पर उतरती सूरज की छाया
जैसे बदलती हर पहर के रूप
गाढ़े रंग, हल्के रंग
आढ़ी, तिरछी रोशनी की लकीरें
सब उतर गए थे छवि के संग
उन के बीच में थी
वो
उदास आँखें जो
बीन रहीं थी
बसंत में खिले
रोशनी से भरे
सफ़ेद चेरी के फूल।
___________________
Wednesday, February 10, 2010
चिरैया
फुनगी पर बैठी थी चिड़िया,
लपकी थी नभ की ओर
चुराई थी सांझ की लाल डिबिया
उड़ाई थी, फुटकायी थी
बनी थी गुलाबी गुलाल चिरैया।
ले के सांझ के संदेसे
लौटी थी अपने नीड़
पातियों को किया कंठबद्ध
स्वर दिया, संगीत दिया
बनी थी काली कोयल गौरया
भोर के पास पहुँचाने थे संदेसे
तड़के उठ कर स्नान किया
मंदिर की फेरी लगाई
प्रार्थना की, घंटी बजाई
बनी थी सौम्य दादी चिरैया
पगडंडी पर भागी
अम्बर से कलसी ढुलकाई
सूरजमुखी को सींच कर
इतराई, फ़िर भरमाई
बनी थी पागल पीत सोनचिरैया
___________________
लपकी थी नभ की ओर
चुराई थी सांझ की लाल डिबिया
उड़ाई थी, फुटकायी थी
बनी थी गुलाबी गुलाल चिरैया।
ले के सांझ के संदेसे
लौटी थी अपने नीड़
पातियों को किया कंठबद्ध
स्वर दिया, संगीत दिया
बनी थी काली कोयल गौरया
भोर के पास पहुँचाने थे संदेसे
तड़के उठ कर स्नान किया
मंदिर की फेरी लगाई
प्रार्थना की, घंटी बजाई
बनी थी सौम्य दादी चिरैया
पगडंडी पर भागी
अम्बर से कलसी ढुलकाई
सूरजमुखी को सींच कर
इतराई, फ़िर भरमाई
बनी थी पागल पीत सोनचिरैया
___________________
Wednesday, January 27, 2010
गुल्लक
लम्हे, गुल्लक में
रेज़गारी से खनकते हैं
हर दिन रुई से भरी दोहड़
के लिए ललकते हैं।
एक लम्हा,
जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,
लाल, पीले फूलों वाली,
किस, किस पगडंडी से गुज़रती है,
ठिठुरन में जलते अलावों सी
धूप की सगी बहन लगती है,
मुलायम सी रेशमी तारों की
देवों के दुशाले सी लगती है,
उड़न खटोले सी जादुई
आँखों में सपनों सी विचरती है,
दुकान में वो ही,
अमूल्य निधि दिखती है,
कोहरा भी छट जाता है,
आज का लम्हा भी गुल्लक
में जमा हो जाता है,
खनकता है,
कल शायद....
______________
रेज़गारी से खनकते हैं
हर दिन रुई से भरी दोहड़
के लिए ललकते हैं।
एक लम्हा,
जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,
लाल, पीले फूलों वाली,
किस, किस पगडंडी से गुज़रती है,
ठिठुरन में जलते अलावों सी
धूप की सगी बहन लगती है,
मुलायम सी रेशमी तारों की
देवों के दुशाले सी लगती है,
उड़न खटोले सी जादुई
आँखों में सपनों सी विचरती है,
दुकान में वो ही,
अमूल्य निधि दिखती है,
कोहरा भी छट जाता है,
आज का लम्हा भी गुल्लक
में जमा हो जाता है,
खनकता है,
कल शायद....
______________
Saturday, January 23, 2010
नज़रिया
फ़ुटपाथ के बैंच पर
ज़िंदगी के निचोड़ को
छूटे हुए अखबार की तरह
छोड़ आए थे,
कुछ मेरे विचार थे
कुछ तुम्हारी सोच
तुम्हारी धारणा थी
समाज को बदलना है,
मैं अपनी
परिधि के दायरे को
विकसित करना चाह्ती थी,
कल अखबार बारिश में भीगा,
आज धूप में सूखा,
अब अलावों के बीच सुलग रहा है,
ज़िंदगी का निचोड़
अखबार की सुर्खियों में,
कहीं समाज बदल रहा है और
कहीं मेरी परिधि को और विकसित कर रहा है।
हर दिन सुबह बैंच पर
फैलती हुई धूप के समान
_______________
ज़िंदगी के निचोड़ को
छूटे हुए अखबार की तरह
छोड़ आए थे,
कुछ मेरे विचार थे
कुछ तुम्हारी सोच
तुम्हारी धारणा थी
समाज को बदलना है,
मैं अपनी
परिधि के दायरे को
विकसित करना चाह्ती थी,
कल अखबार बारिश में भीगा,
आज धूप में सूखा,
अब अलावों के बीच सुलग रहा है,
ज़िंदगी का निचोड़
अखबार की सुर्खियों में,
कहीं समाज बदल रहा है और
कहीं मेरी परिधि को और विकसित कर रहा है।
हर दिन सुबह बैंच पर
फैलती हुई धूप के समान
_______________
Friday, December 18, 2009
मत्स्य
रात का आखिरी पहर जब और गाढ़ा हो,
जब हाथ को हाथ न सूझे,
अंधेरे में मुट्ठी भर शब्द
मोगरे की तरह महक उठे,
अंधेरे की रेशमी तह
चूम कर बलैयां लेती रहें,
तुम सिरहाने बैठ कर
शांत, निर्लिप्त, विरक्त
समुद्र में नौका खेते रहो
और,
मैं फेनल से भीगी मत्स्य
अर्जित कर दूँ तुम्हें वह बूँद
जो अमृत सी कंठ में बिंधी रहे,
प्यास बुझाती रहे युगों तक
आदि से अनंत तक।
______________________
जब हाथ को हाथ न सूझे,
अंधेरे में मुट्ठी भर शब्द
मोगरे की तरह महक उठे,
अंधेरे की रेशमी तह
चूम कर बलैयां लेती रहें,
तुम सिरहाने बैठ कर
शांत, निर्लिप्त, विरक्त
समुद्र में नौका खेते रहो
और,
मैं फेनल से भीगी मत्स्य
अर्जित कर दूँ तुम्हें वह बूँद
जो अमृत सी कंठ में बिंधी रहे,
प्यास बुझाती रहे युगों तक
आदि से अनंत तक।
______________________
Tuesday, December 01, 2009
गुलाबी पतझड़
कुनमुनी रातें
अलाव सिकी यादें,
कुलमुलाती हैं
सखी की बातें
ठौर-ठौर पिये
चाँदनी का दोना लिये,
मढ़ती रात
तारों के धागे लिये
पोरों पर कसती
रानी कहानी रचती,
सूखी पीली पत्ती
अम्बर पर लिखती
मन गुंथी सांझ
झर गए पात-पात,
गुलाबी पतझड़ जाए
सखी घर याद आए।
अलाव सिकी यादें,
कुलमुलाती हैं
सखी की बातें
ठौर-ठौर पिये
चाँदनी का दोना लिये,
मढ़ती रात
तारों के धागे लिये
पोरों पर कसती
रानी कहानी रचती,
सूखी पीली पत्ती
अम्बर पर लिखती
मन गुंथी सांझ
झर गए पात-पात,
गुलाबी पतझड़ जाए
सखी घर याद आए।
Sunday, October 25, 2009
गाँठ
मेरे सर्वस्व की गाँठ
पानी, आग, धरा, पंचतंत्रो से गुँथी है,
अक्षत, रोली, मौली, धूप, दीप
से बनी है,
देवी, देवताओं, खड़िया से दीवार पर सजी है,
पेड़ों की फ़ुनगी पर नभ से बंधी रहती है
खुलती है तो छाँव सी धूप में घुल जाती है,
दिन जब चढ़ता है तो
बड़ या पीपल पर मन्न्त सी चढ़ जाती है।
________________________
पानी, आग, धरा, पंचतंत्रो से गुँथी है,
अक्षत, रोली, मौली, धूप, दीप
से बनी है,
देवी, देवताओं, खड़िया से दीवार पर सजी है,
पेड़ों की फ़ुनगी पर नभ से बंधी रहती है
खुलती है तो छाँव सी धूप में घुल जाती है,
दिन जब चढ़ता है तो
बड़ या पीपल पर मन्न्त सी चढ़ जाती है।
________________________
Friday, October 23, 2009
फ़ुर्सत के पल
पलाश के दहकते फूल
जब मेरी हथेली पर गिरते हैं,
फिसलते हुए ये जलते सूरज
मेरे मन में परिक्रमा करते हैं ।
-------------
परिधि के घेरे में आ बैठे हैं,
कुछ चिन्ह नियुक्त कर बैठे हैं,
चिन्हों से जूझते हुए
परिधि में खुद को खो बैठे हैं।
__________________
शब्दों का प्रांगण
पहेलियों का आँगन,
चौक जब भी पूरती हूँ,
होता है विचारों का आगमन।
__________________
जब मेरी हथेली पर गिरते हैं,
फिसलते हुए ये जलते सूरज
मेरे मन में परिक्रमा करते हैं ।
-------------
परिधि के घेरे में आ बैठे हैं,
कुछ चिन्ह नियुक्त कर बैठे हैं,
चिन्हों से जूझते हुए
परिधि में खुद को खो बैठे हैं।
__________________
शब्दों का प्रांगण
पहेलियों का आँगन,
चौक जब भी पूरती हूँ,
होता है विचारों का आगमन।
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Thursday, October 08, 2009
मूक अभिवादन
घर की परिधि के दायरे
मेरे मानचित्र पर बिंदु से
उस पगडंडी पर रहते हैं
जहाँ सूर्योदय रोज़ तुम्हारे द्वार पर
लौटती सूर्य किरण की प्रतीक्षा करता है
पहाड़ी के उस ओर से
बादलों की टोली को हवा धकेल ले आती है
और
गुलदावदी के फूल हवा को छुपा कर
यूँ ही लहकते फ़िरते हैं
मैं और मेरा गुमान
तुमसे अनभिज्ञ
चुपचाप उस पगडंडी पर
मील पत्थर रखते जाते हैं,
क्षितिज को सोपान बना कर
परिधि को विस्तृत कर नित
मूक अभिवादन करते हैं।
मैं और मेरा गुमान
तुमसे प्यार किया करते है।
मेरे मानचित्र पर बिंदु से
उस पगडंडी पर रहते हैं
जहाँ सूर्योदय रोज़ तुम्हारे द्वार पर
लौटती सूर्य किरण की प्रतीक्षा करता है
पहाड़ी के उस ओर से
बादलों की टोली को हवा धकेल ले आती है
और
गुलदावदी के फूल हवा को छुपा कर
यूँ ही लहकते फ़िरते हैं
मैं और मेरा गुमान
तुमसे अनभिज्ञ
चुपचाप उस पगडंडी पर
मील पत्थर रखते जाते हैं,
क्षितिज को सोपान बना कर
परिधि को विस्तृत कर नित
मूक अभिवादन करते हैं।
मैं और मेरा गुमान
तुमसे प्यार किया करते है।
Wednesday, September 30, 2009
क्वार गीत
रास्ते में जब रुकी तो
दीवारों के कान उग आए थे
पत्तों की सरसराह्ट थी
आँगन में बुदबुदाहट थी
और
दीवारों की आँखों में रंग भर गए थे
कपाट पर कूची से बूटे खिले थे
सफ़ेद पुती दीवार पर जलाशय बने थे
बाहर
अहाते में तिमिर का कोलाहल बोल रहा था
झींगुर की आवाज़े थीं
चन्द्रकिरण की आने की आह्टें थी
रास्ते में जब रुकी तो
मेरे अंदर डूब गई थी सब आवाज़ें
उग आया था एक दरख्त जहाँ
बसती है लाल गौरैया
गाती है वो क्वार गीत जो
पतझड़ में भी बसंत का आभास दिला जाता है।
दीवारों के कान उग आए थे
पत्तों की सरसराह्ट थी
आँगन में बुदबुदाहट थी
और
दीवारों की आँखों में रंग भर गए थे
कपाट पर कूची से बूटे खिले थे
सफ़ेद पुती दीवार पर जलाशय बने थे
बाहर
अहाते में तिमिर का कोलाहल बोल रहा था
झींगुर की आवाज़े थीं
चन्द्रकिरण की आने की आह्टें थी
रास्ते में जब रुकी तो
मेरे अंदर डूब गई थी सब आवाज़ें
उग आया था एक दरख्त जहाँ
बसती है लाल गौरैया
गाती है वो क्वार गीत जो
पतझड़ में भी बसंत का आभास दिला जाता है।
Thursday, September 17, 2009
आसमानी फूल
सेतू के किनारे खिले थे
कुछ आसमानी फूल,
पानी में बिम्बित था
सुनहरी आकाश अपार,
मैंने आकाश की असीमता
उठा के दी थी तुम्हे,
तुम्हारी असीमता में मुझे मिले
कुछ फूल उपहार में,
आँगन में मेघदूत मिले
काले और बौराए से,
और
संदेसों की झारी में
गुलाब की कुछ पाँखुरी पड़ी
काली स्याह रात में
जब असीमता ढली,
चाँदनी दबे पाँव
ले आई थी कहानी तारों की
और एक उल्का खिली थी
मेरे सिरहाने ले के
कुछ आसमानी फूल
कुछ आसमानी फूल,
पानी में बिम्बित था
सुनहरी आकाश अपार,
मैंने आकाश की असीमता
उठा के दी थी तुम्हे,
तुम्हारी असीमता में मुझे मिले
कुछ फूल उपहार में,
आँगन में मेघदूत मिले
काले और बौराए से,
और
संदेसों की झारी में
गुलाब की कुछ पाँखुरी पड़ी
काली स्याह रात में
जब असीमता ढली,
चाँदनी दबे पाँव
ले आई थी कहानी तारों की
और एक उल्का खिली थी
मेरे सिरहाने ले के
कुछ आसमानी फूल
Saturday, August 01, 2009
तमन्ना
एक तमन्ना छोटी सी,
बड़ी आँखों वाली लड़की की
खामोशी में रहती थी,
लड़की के गालों के गुच्चों में
मुस्कराहट में छिपी रहती थी,
लड़की के काले बालों की
चोटी में फूल सी गुँथी रहती थी
एक तमन्ना बड़ी सी,
रसॊई के आले में
आचार के मर्तबान में रहती है
फ़टी रसीद सी
पंसारी की दुकान में रहती है
माधो, बिट्टो की
शादी के लेन -देन में रहती है
बगीचे के फव्वारे के
नीचे पानी में पड़े सिक्कों में रहती है
छोटी तमन्ना चुलबुली सी
बड़ी तमन्ना संजीदी सी
हर साँझ छुप्पा छुप्पी खेलती हैं
कुट्टी, अब्बा कर के रात को
सपनों में चाँद पर बैठी मिलती हैं।
Friday, July 03, 2009
जेठ बुलाए
उड़ती फ़ूस
कटी-कटी धूप
गुड़-गुड़ करती
बाबा के हुक्के की मूँज
जेठ दुपहरी
छाँव तले गिलहरी
किट-किट करती
अम्मा की सुपारी दिन सून
लम्बे दिन
लम्बी तारीखें
औंधे मुँह ऊँघती
जीजी की किताबें, परचून
गुम हवा
झुलसी धरा
मेढ़ पर सोचती
उसकी आँखें लगी, सब सून
_____________
कटी-कटी धूप
गुड़-गुड़ करती
बाबा के हुक्के की मूँज
जेठ दुपहरी
छाँव तले गिलहरी
किट-किट करती
अम्मा की सुपारी दिन सून
लम्बे दिन
लम्बी तारीखें
औंधे मुँह ऊँघती
जीजी की किताबें, परचून
गुम हवा
झुलसी धरा
मेढ़ पर सोचती
उसकी आँखें लगी, सब सून
_____________
Sunday, April 19, 2009
दुआ
बचपन से दुआएँ साथ चलती हैं
आँगन को बुहारती
टीन के डिब्बे में आम की पौध सी पलती हैं
मेरे हाथ की लकीरों में
गली में स्टापू सी खेलती हैं
रात में सपनों सी
दिन में पूजा के आचमन सी मिलती हैं
बाँस के झुरमुट में
मेरे तलवे के नीचे धूप सी खिलती है
नन्हे पैरों से विचरती
आँगन में ओस की बूँदों सी झरती हैं
बट पर मन्नतों में
मेरी कलाई में मौली से बँधी मिलती है
बचपन से दुआएँ साथ चलती हैं
दीवारों पर फूल के बूटों सी मिलती हैं।
_____________________
आँगन को बुहारती
टीन के डिब्बे में आम की पौध सी पलती हैं
मेरे हाथ की लकीरों में
गली में स्टापू सी खेलती हैं
रात में सपनों सी
दिन में पूजा के आचमन सी मिलती हैं
बाँस के झुरमुट में
मेरे तलवे के नीचे धूप सी खिलती है
नन्हे पैरों से विचरती
आँगन में ओस की बूँदों सी झरती हैं
बट पर मन्नतों में
मेरी कलाई में मौली से बँधी मिलती है
बचपन से दुआएँ साथ चलती हैं
दीवारों पर फूल के बूटों सी मिलती हैं।
_____________________
Tuesday, March 17, 2009
सैलाब
दर्द का सैलाब रुक गया था
कागज़ के कोने पर
अहसास हो रहा था
कोने से टपक कर गिरी जो एक भी बूँद
अन्तराल की गहराईयों तक जाएगी
जहाँ अँधेरा
काली चिकनी चट्टान सा
शून्य सा जड़
आहिल्या की तरह पाषाण सा होगा
और दर्द की बूँद जब टपक कर गिरेगी
अन्तर्नाद करती हुई
एक उल्का
अनगणित फुलझड़ियाँ सी जलेगी।
_______________
कागज़ के कोने पर
अहसास हो रहा था
कोने से टपक कर गिरी जो एक भी बूँद
अन्तराल की गहराईयों तक जाएगी
जहाँ अँधेरा
काली चिकनी चट्टान सा
शून्य सा जड़
आहिल्या की तरह पाषाण सा होगा
और दर्द की बूँद जब टपक कर गिरेगी
अन्तर्नाद करती हुई
एक उल्का
अनगणित फुलझड़ियाँ सी जलेगी।
_______________
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