रात की कहानी
सुराही से रिसता पानी
छत की मुँडेर के पास ठहर गया था।
रात ने चाँद को सकोरे में उड़ेल कर
मुझे दिया था।
मैं अँजुरी में चाँद भर रही थी।
अँगुलियों से रिसती चाँदनी
अँजुरी में मावस भर रही थी।
सोच रही थी,
जब दूज का चाँद निकलेगा
तो अँजुरी फ़िर भरूँगी।
तुमसे रात की कहानी फ़िर
सुनूँगी।
छत की मुँडेर के पास ठहर गया था।
रात ने चाँद को सकोरे में उड़ेल कर
मुझे दिया था।
मैं अँजुरी में चाँद भर रही थी।
अँगुलियों से रिसती चाँदनी
अँजुरी में मावस भर रही थी।
सोच रही थी,
जब दूज का चाँद निकलेगा
तो अँजुरी फ़िर भरूँगी।
तुमसे रात की कहानी फ़िर
सुनूँगी।

