नव वर्ष
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार,
जब राह के पँछी घर को लौटें,
जब पेड़ के पत्ते झर-झर जाएँ,
जब आकाश ठँड का कोहरा ओढ़े,
आँखों के पानी से लिखी पाती मिल जाए,
एक उजले स्वप्न सा आँखों में भर लेना,
आँखों की नमी से मुझको भिगो देना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार ,
जब फ़सल कटने के दिन आयें,
धान के ढेर लगे हों घर द्वार ,
लोढ़ी, संक्राति और पोंगल लाये पके धान की बयार,
बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार,
तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना,
मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार,
जब भी भीड़ में चलते-चलते कोई पुकारे मुझे
और मैं पीछे मुड़ कर देखूँ ,
तुम मेरे कंधे पर हाथ रख कर,
कानों में चुपके से कुछ कह कर,
थोड़ी देर के लिये अपना साथ दे जाना,
भीड़ के एकाकीपन में अपना परिचय दे जाना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार.
जब राह के पँछी घर को लौटें,
जब पेड़ के पत्ते झर-झर जाएँ,
जब आकाश ठँड का कोहरा ओढ़े,
आँखों के पानी से लिखी पाती मिल जाए,
एक उजले स्वप्न सा आँखों में भर लेना,
आँखों की नमी से मुझको भिगो देना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार ,
जब फ़सल कटने के दिन आयें,
धान के ढेर लगे हों घर द्वार ,
लोढ़ी, संक्राति और पोंगल लाये पके धान की बयार,
बसंत झाँके नुक्कड़ से बार-बार,
तुम सुस्ताने पीपल के नीचे आ जाना,
मेरी गोद में अपनी साँसों को भर जाना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार,
जब भी भीड़ में चलते-चलते कोई पुकारे मुझे
और मैं पीछे मुड़ कर देखूँ ,
तुम मेरे कंधे पर हाथ रख कर,
कानों में चुपके से कुछ कह कर,
थोड़ी देर के लिये अपना साथ दे जाना,
भीड़ के एकाकीपन में अपना परिचय दे जाना ।
नव वर्ष के कोरे पन्नों पर भेज रही हूँ गुहार.

